प्रेरणादायी कहानियाँ, प्रश्नोत्तरी, वक्तृत्व प्रतियोगिता, प्रार्थना ,गीत, श्लोक, खेलकूद व कौशल प्रतियोगिताएँ, दैनंदिनी आदि अनेक नवीन उपक्रमों के माध्यम से बालकों में संस्कार पुट डालने का कार्य यही 'संस्कार सृजन' है।
प्रेरणादायी कहानियाँ, प्रश्नोत्तरी, वक्तृत्व प्रतियोगिता, प्रार्थना ,गीत, श्लोक, खेलकूद व कौशल प्रतियोगिताएँ, दैनंदिनी आदि अनेक नवीन उपक्रमों के माध्यम से बालकों में संस्कार पुट डालने का कार्य यही 'संस्कार सृजन' है।
प्रेरणादायी कहानियाँ, प्रश्नोत्तरी, वक्तृत्व प्रतियोगिता, प्रार्थना ,गीत, श्लोक, खेलकूद व कौशल प्रतियोगिताएँ, दैनंदिनी आदि अनेक नवीन उपक्रमों के माध्यम से बालकों में संस्कार पुट डालने का कार्य यही 'संस्कार सृजन' है।
प्रेरणादायी कहानियाँ, प्रश्नोत्तरी, वक्तृत्व प्रतियोगिता, प्रार्थना ,गीत, श्लोक, खेलकूद व कौशल प्रतियोगिताएँ, दैनंदिनी आदि अनेक नवीन उपक्रमों के माध्यम से बालकों में संस्कार पुट डालने का कार्य यही 'संस्कार सृजन' है।
प्रेरणादायी कहानियाँ, प्रश्नोत्तरी, वक्तृत्व प्रतियोगिता, प्रार्थना ,गीत, श्लोक, खेलकूद व कौशल प्रतियोगिताएँ, दैनंदिनी आदि अनेक नवीन उपक्रमों के माध्यम से बालकों में संस्कार पुट डालने का कार्य यही 'संस्कार सृजन' है।
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प्रेरणादायी कहानियाँ, प्रश्नोत्तरी, वक्तृत्व प्रतियोगिता, प्रार्थना ,गीत, श्लोक, खेलकूद व कौशल प्रतियोगिताएँ, दैनंदिनी आदि अनेक नवीन उपक्रमों के माध्यम से बालकों में संस्कार पुट डालने का कार्य यही 'संस्कार सृजन' है।
प्रेरणादायी कहानियाँ, प्रश्नोत्तरी, वक्तृत्व प्रतियोगिता, प्रार्थना ,गीत, श्लोक, खेलकूद व कौशल प्रतियोगिताएँ, दैनंदिनी आदि अनेक नवीन उपक्रमों के माध्यम से बालकों में संस्कार पुट डालने का कार्य यही 'संस्कार सृजन' है।
संस्कार महोत्सव याने एक ही समय अनेक स्थानों पर संस्कार केंद्रों का आयोजन कर अंतिम दिन सभी केंद्रों के बालक एक स्थान पर एकत्रित होकर संस्कार ऊर्जा के संगठित शक्ति का अनुभव करते हैं. इसके लिए सर्वप्रथम कार्यकर्ताओं का चयन तथा प्रशिक्षण होता है.
बालक ही राष्ट्र की सच्ची धरोहर हैं, अगर बाल्यावस्था से ही इन्हें सही आकार देने का प्रयास किया जाय तो बालकों का सम्पूर्ण जीवन सुन्दर बन सकता है क्योंकि बाल्यावस्था में प्राप्त संस्कार बालक के सम्पूर्ण जीवन में मार्गदर्शक ठरते हैं
बचपन में भविष्य का गर्भ छिपा होता है. आने वाले कल का दर्पण होता है बचपन. बचपन छोटा होता है किन्तु अमूल्य होता है.
बच्चों के बालपन को सहेजने का, उसे नित नए अनुभव देने का, प्रयोग के नए-नए अवसर देने का, अवलोकन करने, नए-नए शब्द सिखाने का, खेलने-कूदने का कार्य गीता परिवार संगमनेर द्वारा संचालित संस्कार बालभवन करता है.
व्याख्यान समाप्त हो चुका था. पालकों की भीड़ धीरे-धीरे कम हो रही थी किन्तु पालकों की इस भीड़ में एक किशोर चुपचाप खड़ा था. शायद सभी के चले जाने की प्रतीक्षा कर रहा था. और ऐसा ही हुआ. एकांत जैसा अनुभव होने पर वह बालक व्याख्याता से मिलता है
पूज्य स्वामीजी के निर्देशानुसार संस्कृत स्तोत्र और गीता सिखाते समय उच्चारण की शुद्धता पर विशेष ध्यान दिया जाता है. गीता परिवार का कार्य जैसे-जैसे बढ़ता गया वैसे-वैसे ऐसे कार्यकर्ताओं के निर्माण की आवश्यकता भी प्रतीत हुई जो संस्कृत उच्चारण शुद्ध रूप से कर सकें.
कार्यकर्ता प्रशिक्षण वर्ग तो स्थानीय शाखा के स्तर पर आयोजित होते ही रहते हैं. इन शिविरों में हजारों कुशल कार्यकर्ताओं का निर्माण हुआ है. ये कार्यकर्ता गीता परिवार द्वारा प्रवाहित संस्कार-धारा के ऐसे वाहक बन गए जिन्होंने देश के गाँव-गाँव तक पहुँचाया.
अष्टांगयोग अनुसार यम से सामाजिक शुचिता, नियम से व्यक्तिगत शुचिता, आसन - प्राणायाम से विज्ञाननिष्‘ निरंतर प्रयास और अंतरंग साधना अर्थात प्रत्याहार-धारणा-ध्यान-समाधि से आनंदमय लैकिक जीवन के साथ पारमार्थिक मार्ग प्री स्पष्ट प्रकाशित होता है.
नाटक बाल-संस्कार का एक प्रबल और प्रभावी साधन है. बाल-नाटय बच्चों को एक नए ज्ञानात्मक संसार से परिचित करते हैं. एक नया द्वार खोल कर अनुकरण का नया क्षेत्र प्रदान करते हैं. रंगमंच उनकी क्रियात्मकता को अभिव्यक्ति देता है.
अष्टांगयोग अनुसार यम से सामाजिक शुचिता, नियम से व्यक्तिगत शुचिता, आसन - प्राणायाम से विज्ञाननिष्ठ निरंतर प्रयास और अंतरंग साधना अर्थात प्रत्याहार-धारणा-ध्यान-समाधि से आनंदमय लैकिक जीवन के साथ पारमार्थिक मार्ग भी स्पष्ट प्रकाशित होता है.
बाल संस्कार के क्षेत्र में कार्यरत गीता परिवार के लिए कथाकथन बड़ा ही महत्वपूर्ण स्थान रखता है. कथा-कथन के माध्यम से जीवन मूल्यों की शिक्षा प्रभावी ढंग से दी जा सकती है, इसलिए कथाकथन संस्कार वर्गों और शिविरों का अभिन्न अंग होता है.
खेल उतने ही प्राचीन हैं जितना इस पृथ्वी पर मानवी जीवन. मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य, निर्णय-कौशल, समूह-कार्य, चपलता, कल्पना-शक्ति, स्मरण-शक्ति, रणनीति और योजना बनाना ऐसे कितने ही अंगों का विकास खेलों के माध्यम से सहज ही हो जाता है.
सूर्य अन्नदाता है. सूर्य-किरणों के अभाव में किसी सजीव की उत्पत्ति एवं विकास संभव नहीं. सूर्य ऊर्जा का स्त्रोत है. प्रकृति का संपूर्ण चक्र सूर्य पर अवलंबित है. सूर्य-दर्शन से मन प्रसन्न होता है एवं बुद्धि प्रतिप्रासंपन्न होती है.